स्वदेशी और प्रादेशिक नस्ल का महत्त्व
- मित्रों, कभी-कभी आपको यह बताया जाता है कि विदेशी गोमाता की नस्ल ही श्रेष्ठ है, जैसेकि जर्सी या होलस्टीन। तो कभी हमें यह बताया जाता है कि गीर, कांकरेज या साहीवाल सबसे श्रेष्ठ गाय है।
- लेकिन सत्य तो यह है कि जिस गोमाता की प्रजाति ने हमारे क्षेत्र या प्रदेश को सदियों से अपनी उपस्थिति का आशीर्वाद दिया है, पोषित किया है, हमारे स्थान और वातावरण के लिए वही सर्वश्रेष्ठ गोमाता हैं।
- गोमाता की कोई एक नस्ल को सर्वश्रेष्ठ मानना सही नहीं है, देसी गोमाता की सभी स्वदेशी और प्रादेशिक नस्ल श्रेष्ठ हैं।
- हृदय से मेरी विनती है जो मैं कई बार कह चुका हूँ और आगे भी कहता रहूँगा कि आपको अपने प्रदेश की देसी गोमाता की नस्ल की रक्षा करनी है।
- कुछ अंतराल पूर्व संगमनर, महाराष्ट्र से एक भाई आए थे जो प्रारंभ में गीर गोमाता का पालन व संवर्धन करना चाहते थे।
- तब हमने यही कहा कि आपके क्षेत्र की गोमाता ने आपका और आपके पूर्वजों का हजारों वर्षों से पोषण और रक्षण किया है तो आपको आगे भी उनकी ही सेवा करनी चाहिये।
- वह डांगी गोमाता को लेकर आए और वैदिक मार्गदर्शन से कार्य प्रारंभ किया, दो आँचल का दूध लिया, उन्हें अच्छे से चारा दिया और उन्हें प्रेम और आदर से रखा।
- परिणाम कुछ ऐसा हुआ कि 1.5 से 2 लीटर की औसत से दूध देने वाली डांगी गोमाता 4-6 लीटर की औसत से दूध देने लगी और 12 लीटर तक भी पहुंची।
- वो चारा गीर गोमाता को लगता है उनकी तुलना में केवल ३०% खाया। इसका अर्थ तो यह हुआ कि एक गीर गोमाता के पालन के खर्च में ३ डांगी गोमाता पल गई।
- दूसरी बात यह है कि वहाँ की गोमाता को आँचल के रोग नहीं हैं, गर्भाशय बाहर आने की तकलीफ नहीं रहती और प्रोलैप्स (Prolapse) की भी समस्या नहीं रहती।
- इसके अलावा आपको बताना चाहूँगा कि गुजरात की गीर गोमाता सामान्यतः ८ से १२ लीटर तक दूध देती है। तो अच्छे से पालन करने पर डांगी गोमाता गीर गोमाता से भी आगे निकल गई।
- हम भारत की ऐसी २० देसी प्रजाति की गोमाता पर कार्य कर रहे हैं। हमारे अनुभव का निष्कर्ष यही है कि भारत की सभी देसी गोमाता की प्रजाति अच्छी हैं, जो कमी है वह हम मनुष्यों में ही है।
- अतः मेरी यही विनती है कि आप अपने यहां की स्वदेशी और प्रादेशिक गोमाता को वापस लाइए, उनको अच्छे से खेती से जोड़िए।
- गोमाता दूध नहीं देगी या कम दूध देगी तो भी उनके पालन में आर्थिक सहजता रहेगी और सारा कार्य प्राकृतिक योजना के अनुसार ही चलेगा।
- वरिष्ठ किसान और गोपालक कहते हैं कि भारत की आज़ादी के समय ३० से ४० करोड़ गोवंश थे और १०० से अधिक प्रकार की नस्ल थी लेकिन आज शुद्ध नस्ल ढूँढने जाएंगे तो ३६ से ४० ही रह गई है और शुद्ध गोवंश ६ से ७ करोड़ भी मिलना कठिन होगा।
- इसलिए हमें हमारी स्वदेशी और प्रादेशिक नस्ल को वापस लाना है और उनकी सही प्रकार से वृद्धि करनी है। हमें भारत की सभी स्वदेशी और प्रादेशिक नस्लों को फिर से खेत और किसानों से जोड़ना है, उनकी श्रद्धापूर्वक प्रेम से सेवा करनी है।
- परिणाम स्वरूप भविष्य में हम जो आध्यात्मिक विकास, ज्ञान और समृद्धि प्राप्त करेंगे वह अतुलनीय होगा।
- गो-कृपा अमृतम् से गो-आधारित खेती के साथ हम भारत की सभी स्वदेशी और प्रादेशिक गोमाता की नस्लों को समाज में पूजनीय पद पर पुनः स्थापित करने के अभियान में विश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं।
- शहर में रहने वाले लोग पूछ सकते हैं कि देसी गाय का दूध ही क्यों? विदेशी गाय का दूध इतना लाभकारी क्यों नहीं है? इसका उत्तर हम आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोण से समझते हैं।
- आधुनिक पश्चिमी विज्ञान यह मानता है कि विश्व की सभी गायों का विकास भारत के प्राचीन "औरक" (aurach) नामक जंगली प्राणी से २० लाख से २ लाख साल पहले हुआ था।
- औरक पहले भारत से विश्व के मध्य पूर्व (Middle East) हिस्से में जा बसे। जब यह औरक यूरोप गए तो इनका परिवर्तन टौरीन (taurine) जाति में हुआ जिनकी प्रजाति जर्सी, होलस्टीन आदि को हम जानते हैं।
- भारत में रह कर औरक का परिवर्तन जेबू (zebu) जाति में हुआ जिनकी प्रजाति है हमारी स्वदेशी और प्रादेशिक नस्ल।
- यह तो हुई पश्चिमी पेलिएंटोलोजी और जेनेटिक्स विज्ञान के दृष्टिकोण से बात। चलो अच्छा है कि आधुनिक पश्चिमी विज्ञान इतना तो मानता है कि गाय की उत्पत्ति भारत में ही हुई थी।
- कई आधुनिक वैज्ञानिक तो यह भी मानते हैं कि कहने को तो दोनों गाय ही हैं, लेकिन इनकी जेनेटिक्स के दृष्टिकोण से जाति बिलकुल भिन्न है, जिसका प्रत्यक्षीकरण है उनके शरीर में उपस्थित खूंध और गलकंबल।
- अब आप ही सोचिए, जिस नस्ल का विकास और परिवर्तन हजारों सालों पहले भारत की दिव्य भूमि में हुआ हो, यहाँ की नदियों, पर्वतों और जंगलों के बीच रह कर, उसकी तुलना किसी यूरोपीय गाय से हो सकती है क्या?
- चलिये आगे और जानते हैं कि आधुनिक विज्ञान हमारे वेदों से कैसे सुर मिला रहा है।
- आधुनिक विज्ञान यह कहता है कि देसी गाय के दूध में A2 प्रोटीन होता है और अधिकतर विदेशी गाय के दूध में A1 प्रोटीन होता है। A1 प्रोटीन पचाने में कठिन होता है और इससे कई बीमारियाँ होती है जैसे - हृदय और दिमाग की बीमारी, मोटापा, डायाबिटीज़ इत्यादि। इसकी तुलना में A2 प्रोटीन पचाने में हल्का होता है और इससे बीमारियाँ नहीं होती।
- हम इसे और विस्तार से समझें तो पता चलता है कि A1 प्रोटीन को पचाते समय हमारे शरीर में बीटा-केसोमोर्फीन-7 (beta-casomorphine-7) यानी कि बीसीएम-7 (BCM-7) नामक पदार्थ उत्पन्न होता है, जो A2 प्रोटीन में नहीं होता। परिणाम स्वरूप वैज्ञानिक मानते हैं कि A1 प्रोटीन संभवतः ओटिस्म और शिज़ोफ़्रेनीया जैसी दिमागी बीमारियों को जन्म देता है और बच्चों में A1 प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थों की लत को जागृत करता है।
- औरक पहले भारत से विश्व के मध्य पूर्व (Middle East) हिस्से में जा बसे। जब यह औरक यूरोप गए तो इनका परिवर्तन टौरीन (taurine) जाति में हुआ जिनकी प्रजाति जर्सी, होलस्टीन आदि को हम जानते हैं।
- A1 प्रोटीन बच्चों और बूढ़ों में यह कब्ज़ को भी उत्पन्न करता है।
- इसके उपरांत A1 प्रोटीन में हिस्टिडीन (histidine) नामक तत्व होता है जो पाचन प्रक्रिया में हिस्टामिन (histamine) उत्पन्न करता है। हिस्टामिन की वजह से एलर्जी होने की संभावना बढ़ती है, जैसे एलर्जिक राइनाइटिस यानी की एलर्जिक सर्दी-जुकाम, चमड़ी के रोग और अस्थमा।
- A1 दूध में उपस्थित चर्बी और कार्बोहाइड्रेट "लेक्टोज़ इनटोलरंस" (दूध को पचाने में तकलीफ), डायाबिटीज़ और मोटापा जैसी बीमारियों को बढ़ाता है।
- A1 दूध पेट में रोगजनक बैक्टीरिया को पोषित करता है और इसकी तुलना में A2 दूध पेट में लाभकारक बैक्टीरिया को पोषित करता है।
- हम मानते हैं कि आधुनिक विज्ञान जो कहता है इसे जानना हमारी जागरूकता और सामान्य ज्ञान के लिए अच्छा है। इसके बारे में अगर कहीं चर्चा हो तो हमें इन सब चीज़ों की जानकारी होनी चाहिये।
- लेकिन इसके साथ आप हमेशा याद रखें कि A1/A2, बीटा-केसोमोर्फीन-7, इत्यादि जैसी शब्दावली से जुड़ा अनुसंधान तो १९९० के दशक में ही प्रकाशित हुआ है।
- देसी नस्ल की गोमाता का दूध और उसके महत्त्व के बारे में हमारे शास्त्रों में सदियों से लिखा गया है। गोमाता के उचित पालन और संवर्धन के बारे में भी हमारे प्राचीन वेदों में विस्तृत वर्णन है।
- संभवतः A1/A2 से जुड़े अनुसंधान और उसके प्रचार के पीछे विदेशी कंपनियों का व्यापारिक लाभ भी जुड़ा हो सकता है।
- A1/A2 आनुवंशिक जाँच (Genetic Testing) टेक्नोलॉजी का लाइसेन्स और “A2 Milk” का व्यापार-चिह्न (ट्रेडमार्क) एक ओस्ट्रेलियन कंपनी के हाथ में है, जिसकी स्थापना A1/A2 के ऊपर अनुसंधान करने वाले डॉ कोरी मेकलाचलन (Dr. Corrie McLachlan) नामक वैज्ञानिक ने साल २००० में की थी।
- इस अनुसंधान के आधार पर स्थापित की गई इस कंपनी की क़ीमत ऑस्ट्रेलियन शेयर बाज़ारों में दिसम्बर २०२० में १००० करोड़ डॉलर की थी, और यह कंपनी अमेरिका, चीन, न्युज़ीलैन्ड जैसे देशों में तेज़ी से फैल रही है।
- A1-A2 के चक्कर में न पड़कर अगर हम इसे सामान्य बुद्धि का उपयोग करके समझें तो विदेशी गाय आनुवंशिक (genetic) रूप से विदेशी वातावरण के अनुरूप है। जब हम उन्हें भारत लाते हैं तो यहाँ के वातावरण में उन्हें स्वस्थ रहने में तकलीफ होती है।
- इसके उपरांत विदेशी गाय की अधिकतर नस्लों को आनुवंशिक रूप से परिवर्तित किया गया है (genetically modified), जिसके कारण उनके स्वास्थ्य और गव्यों में कमजोरी आती है।
- कुछ विदेशी नस्लों में तो अन्य प्राणियों के वंशाणु (जीन्स) भी मिलाये गए हैं जिसके कारण दुर्भाग्य वश वह शुद्ध रूप से गाय भी नहीं रहे।
- अब हम सब जानते हैं कि जब माँ स्वस्थ नहीं तो उनके दूध के माध्यम से बच्चों में भी स्वास्थ्य सम्बन्धी तकलीफ़ों की संभावना बढ़ जाती है।
- इसकी तुलना में देसी गोमाता यहाँ के स्वदेशी और प्रादेशिक वातावरण में सदियों से उपस्थित हैं। आयुर्वेद में भी इन्हीं के गव्यों की प्रशंसा की गयी है।
- इस बात को अगर हम आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझें तो स्वदेशी और प्रादेशिक नस्लों ने हमारे विस्तार को सदियों से आशीर्वादित किया है, तथा हमें और हमारी धरती को पोषित किया है।
- इनकी उचित सेवा करके प्राप्त किए गव्यों को ग्रहण करके हम अवश्य अपने स्वास्थ्य और जीवन को सुधार सकते हैं।
- गोमाता का स्थानांतरण करना, विदेशी गाय को यहाँ लाना, देशी गाय को विदेश ले जाना, एक प्रदेश की गाय को दूसरे प्रदेश ले जाना इत्यादि कुछ हद तक ठीक हो सकता है, लेकिन बड़े पैमाने पर ऐसा करना धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संभवतः ठीक नहीं है।